अरविंद तिवारी कलम से

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)- हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी सनातन सिद्धान्त के यज्ञादि प्रकल्प की महत्ता की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि  सनातन धर्मियों के यज्ञादि सब प्रकल्प सर्वहित की भावना से भावित होने के कारण लौकिक – पारलौकिक उत्कर्ष  के ख्यापक हैं ; तद्वत् व्यवहार और परमार्थ के परिपोषक हैं ; अतएव भौतिकवादियों की भी आस्था के केन्द्र हैं। लौकिक पारलौकिक उत्कर्ष और परमात्म प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त – यह सनातन धर्म की अद्भुत विशेषता है। वस्तु स्थिति ऐसी होने पर भी निसर्ग सिद्ध तथा विधि प्रयुक्त शोषण का पर्यवसान पोषण में इस रहस्य केअनभिज्ञों की दृष्टि में यज्ञकुण्ड में अन्न , घृत , वस्त्रादि का हवन कर उन्हें राख बना देना अवश्य ही अनुचित और असह्य है। यद्यपि बाह्य दृष्टि से ऐसा ही परिलक्षित होता है ; तथापि विचार करने पर द्रव्य यज्ञ की उपयोगिता के आधार पर उसकी सहिष्णुता भी सम्भव है। जौ , गेहूँ आदि के बीज ऋतु काल में अनुकूल भूमि में विधिवत् निक्षिप्त किये जाने पर बीज की आकृति का लोप होने पर भी उनके अवयव का विलोप नहीं होता। अंकुरादि क्रम से एक बीज से अनेक बीज की प्राप्ति अवश्य होती है। विधि प्रयुक्त शोषण से पोषण की सिद्धि का यह सर्वमान्य लौकिक दृष्टान्त है। सूर्य अपनी रश्मियों से जलाशयनिष्ठ रस का कर्षण कर उसे आत्मसात् कर समय पर शुद्ध , मधुर , शीतल, विपुल कर्षण कर जगजीवन सिद्ध होते हैं। शोषण से पोषण की सिद्धि का यह सर्वमान्य निसर्ग सिद्ध लौकिक दृष्टान्त है। वायु देव पुष्पादि निष्ठ गन्ध का , जलाशय निष्ठ रस का तथा तेजोनिष्ठ उष्णता का कर्षण कर उसे चतुर्दिक विकीर्ण करते हैं। शोषण से पोषण की सिद्धि का यह सर्वमान्य निसर्ग सिद्ध लौकिक दृष्टान्त है। कोष्ठाग्नि को समर्पित अन्न का पर्यवसान मल , मांस मन में होता है। कोष्ठाग्नि को समर्पित जल का पर्यवसान मूत्र, रक्त तथा प्राण में होता है। कोष्ठाग्नि को समर्पित दुग्ध – घृतादि तैजस प्राय पदार्थों का पर्यवसान अस्थि मज्जा तथा वाक् में होता – है। कोष्ठाग्नि को समर्पित अन्न का परिपाक क्रमश: रस , रक्त , मांस , मेद , स्नायु , अस्थि , मज्जा, शुक्र मान्य है। शोषण से पोषण की सिद्धि का यह सर्वमान्य आध्यात्मिक दृष्टान्त है। समष्टि पवन के कर्षण से व्यष्टि जीवन की सिद्धि यह सर्वमान्य आध्यात्मिक दृष्टान्त है। यमुना के गङ्गा में लय से गङ्ग भावापत्ति, गङ्गा के सागर में लय से सागर भावापत्ति अशेष नाश की असिद्धि है। अन्न के परिपाक के लिये और शीत तथा तमस् के निवारण के लिये अग्नि में इन्धन की आहुति – एक क्रिया से तीन फल की सिद्धि अभिमत उदाहरण है। दिव्य और दृढ़ कलेवर की समुपलब्धि के लिये निज कलेवर को  हवि मानकर , इन्द्रियों को याजक मानकर , वसन्त काल को आज्य समझकर , ग्रीष्म को इध्म मानकर , शरत् को रस जानकर सच्चिदानन्द सर्वेश्वर को हविर्भुज (वह्नि) समझकर धारणात्मक हवन अपेक्षित है।


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