चिरायु टीम की नजर पड़ी तो खुली इलाज की राह, एम्स रायपुर में कॉकलियर इम्प्लांट के बाद सुनने लगी बस्तर की मासूम
ओमप्रकाश रजक
जगदलपुर (गंगा प्रकाश। कभी दुनिया की आवाजों से अनजान रहने वाली पांच वर्षीय परिक्रमा साहू की जिंदगी में अब हर दिन नई ध्वनियां लेकर आता है। घर में माता-पिता की आवाज, आसपास की हलचल और स्कूल में बच्चों की चहचहाहट—आज वह सब सुन सकती है। जन्म से सुनने और बोलने की क्षमता से वंचित रही परिक्रमा अब स्कूल जाने लगी है। यह बदलाव राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत संचालित ‘चिरायु’ टीम, जिला शीघ्र हस्तक्षेप इकाई जगदलपुर और एम्स रायपुर के समन्वित प्रयास से संभव हुआ।
यह कहानी उस समय शुरू हुई, जब परिक्रमा महज तीन वर्ष की थी। जगदलपुर के अघनपुर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में चिरायु टीम नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए पहुंची थी। टीम की नजर एक ऐसी बच्ची पर पड़ी, जो अन्य बच्चों के बीच एक कोने में बिल्कुल शांत बैठी थी। टीम के सदस्यों ने उससे बातचीत करने और उसकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास किया, लेकिन बच्ची की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
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मामला सामान्य नहीं लगा तो चिरायु टीम ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से बच्ची के बारे में जानकारी ली। पता चला कि परिक्रमा जन्म से ही न तो सुन पाती है और न ही बोल पाती है। इसके बाद टीम ने बच्ची के माता-पिता से संपर्क किया और उन्हें पूरी स्थिति समझाते हुए आगे की जांच और उपचार के लिए प्रेरित किया।

परिजन मान चुके थे नियति, चिरायु टीम ने दिखाई नई राह
परिजनों ने बताया कि वे बेटी की जन्मजात समस्या को अपनी नियति मान चुके थे। बच्ची के दिव्यांगता प्रमाण पत्र की प्रक्रिया कराने का प्रयास भी किया जा रहा था। ऐसे समय में चिरायु टीम ने परिवार को समझाया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इस प्रकार की समस्या के लिए उपचार के विकल्प मौजूद हैं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह से बच्ची के सुनने की क्षमता विकसित करने का प्रयास किया जा सकता है।
इसके बाद परिक्रमा को महारानी जिला अस्पताल जगदलपुर स्थित जिला शीघ्र हस्तक्षेप इकाई लाया गया। यहां उसकी आवश्यक जांच कराई गई। जांच में सुनने की क्षमता से संबंधित समस्या की पुष्टि के बाद आगे के विशेषज्ञ उपचार के लिए उसे एम्स रायपुर रेफर किया गया।

ऑपरेशन से पहले एक साल की मेहनत
एम्स रायपुर में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बच्ची की विस्तृत जांच के बाद कॉकलियर इम्प्लांट सर्जरी की सलाह दी। हालांकि सर्जरी से पहले आवश्यक ऑडियो थेरेपी और अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करना जरूरी था। इसके बाद जिला शीघ्र हस्तक्षेप इकाई जगदलपुर के माध्यम से बच्ची को करीब एक वर्ष तक आवश्यक ऑडियो थेरेपी दी गई।
परिवार के लिए यह लंबा इंतजार और लगातार उपचार आसान नहीं था, लेकिन बच्ची के बेहतर भविष्य की उम्मीद ने उन्हें उपचार जारी रखने के लिए प्रेरित किया।
1 अप्रैल 2024 को बदली जिंदगी
आवश्यक प्रारंभिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद 1 अप्रैल 2024 को एम्स रायपुर में परिक्रमा का कॉकलियर इम्प्लांट ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया गया। सर्जरी के बाद धीरे-धीरे उसके जीवन में आवाजों की दुनिया लौटने लगी। लगातार फॉलोअप, प्रशिक्षण और थेरेपी के माध्यम से बच्ची को सुनने तथा बोलने की दिशा में आगे बढ़ाया गया।
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वर्तमान में पांच वर्ष की परिक्रमा को जिला शीघ्र हस्तक्षेप इकाई के माध्यम से नियमित स्पीच थेरेपी भी दी जा रही है। उपचार और निरंतर अभ्यास का असर अब उसके सामान्य व्यवहार में दिखाई देने लगा है।
अब स्कूल की राह पर परिक्रमा
जिस बच्ची को कभी आवाज सुनाई नहीं देती थी और जो बोल नहीं पाती थी, वही परिक्रमा अब स्कूल जाने लगी है। उसके लिए स्कूल जाना केवल पढ़ाई की शुरुआत नहीं, बल्कि उस नई जिंदगी का हिस्सा है, जिसकी उम्मीद उसके परिवार ने शायद खो दी थी।
परिक्रमा के माता-पिता के लिए यह बदलाव किसी बड़ी खुशी से कम नहीं है। बेटी को आवाजों पर प्रतिक्रिया करते और सामान्य बच्चों की तरह स्कूल जाते देख परिवार में खुशी का माहौल है।
यह पूरा मामला इस बात का उदाहरण है कि समय पर स्वास्थ्य परीक्षण, बीमारी की पहचान, उचित रेफरल, विशेषज्ञ उपचार और लगातार थेरेपी किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकते हैं। चिरायु टीम की समय पर पहचान से शुरू हुई प्रक्रिया एम्स रायपुर में सफल सर्जरी और बाद की स्पीच थेरेपी तक पहुंची, जिसने परिक्रमा के लिए सुनने और सामान्य जीवन की राह खोल दी।





