करोड़पतियों, भाजपा पदाधिकारियों और ‘प्रभावशाली’ लोगों को मदद के आरोप

एक ही व्यक्ति को दो-दो बार भुगतान, वर्षों से लगातार लाभ—नियमों की अनदेखी?

बीमार गरीब मरीज को नहीं मिली सहायता, उठे मानवीय और प्रशासनिक सवाल

 

छुरा (गंगा प्रकाश)। मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि को लेकर गरियाबंद जिले में इन दिनों बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वॉट्सऐप ग्रुप्स और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही एक सूची ने प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक नैतिकता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूची में कथित तौर पर ऐसे लोगों को आर्थिक सहायता दिए जाने का दावा किया जा रहा है, जो आर्थिक रूप से सक्षम, प्रभावशाली और सत्ता से जुड़े बताए जा रहे हैं, जबकि वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ नहीं मिल पाने के आरोप सामने आ रहे हैं।

557 हितग्राही, 33.50 लाख की राशि—दो वर्षों से जारी वितरण

वायरल दस्तावेजों के अनुसार, कलेक्टर कार्यालय गरियाबंद द्वारा जारी पत्र क्रमांक 746, 747 एवं 947 (दिनांक 30 मार्च 2026) में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से 33 लाख 50 हजार रुपए की राशि स्वीकृत कर 557 हितग्राहियों के खातों में RTGS के माध्यम से अंतरित किए जाने का उल्लेख है।

बताया जा रहा है कि इसी प्रकार मार्च 2025 में भी लगभग इतनी ही संख्या में हितग्राहियों को सहायता राशि प्रदान की गई थी, जिससे यह मामला और गंभीर हो गया है कि क्या एक ही वर्ग विशेष को लगातार लाभ दिया जा रहा है।

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अनियमितताओं के गंभीर आरोप—एक ही दिन में दो बार भुगतान

सूची के सामने आने के बाद सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि कई व्यक्तियों को एक ही दिनांक में दो-दो बार सहायता राशि प्रदान की गई है। इसके अलावा, कुछ नाम ऐसे भी बताए जा रहे हैं जिन्हें लगातार तीन वर्षों से इस योजना का लाभ मिल रहा है। यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता बल्कि सरकारी नियमों की खुली अनदेखी का मामला बन सकता है।

‘अपात्र’ और ‘प्रभावशाली’ लोगों को लाभ देने के आरोप

वायरल सूची में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उन्हें लेकर सबसे ज्यादा विवाद है। आरोप है कि—करोड़ों रुपए का कारोबार करने वाले व्यापारी,बड़े किसान और जमीनदार,भाजपा मंडल पदाधिकारी और बूथ अध्यक्ष,आयकरदाता एवं आर्थिक रूप से संपन्न परिवार,शासकीय कर्मचारियों के परिजन,निजी अस्पताल संचालक और व्यवसायी इन सभी को स्वेच्छानुदान राशि दी गई, जबकि योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंदों की सहायता करना है।

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सूची में शामिल प्रमुख नामों ने बढ़ाया विवाद

वायरल सूची में कई नामों का उल्लेख किया जा रहा है, जिनके आधार पर आरोप और तेज हो गए हैं—

  • श्रीमती अनिता सिन्हा (पति ईश्वर दयाल सिन्हा) – ₹10,000 और ₹5,000 दो अलग-अलग क्रमांकों में
  • रेखा यदु (पति सोमन यदु) – बड़े किसान परिवार, जनपद सदस्य से जुड़ा
  • मंजूलता हरित / डॉ. हरिश कुमार हरित – निजी अस्पताल संचालक, आयकरदाता
  • रामप्रसाद शांडिल्य – पूर्व सरपंच, चारपहिया वाहन मालिक
  • धर्मेंद्र चंद्राकर / छबिलाल चंद्राकर – बड़े किसान, ट्रैक्टर और किरायेदार संपत्ति
  • बंसती कंवर (पति मोहन कंवर) – शिक्षक परिवार
  • टिकेश्वर वर्मा – बंगला और ट्रैक्टर मालिक
  • सुमीत चंद्र पारख – बड़े व्यवसायी
  • रूपनाथ बंजारे – दो बार सहायता, पत्नी शासकीय कर्मचारी
  • पूर्णिमा कंवर – सेवानिवृत्त लेक्चरर परिवार

इन नामों के आधार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को भी योजना का लाभ दिया गया।

क्या कहते हैं नियम और पात्रता मापदंड?

मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि एक विशेष सहायता मद है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद व्यक्तियों को आपात परिस्थितियों में राहत प्रदान करना होता है। इसके लिए सामान्यतः निम्न नियम और मापदंड लागू होते हैं—

  • यह सहायता मुख्य रूप से गरीब, असहाय एवं आर्थिक रूप से कमजोर (BPL/EWS) वर्ग के लिए होती है।
  • गंभीर बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा, आकस्मिक संकट जैसी परिस्थितियों में प्राथमिकता दी जाती है।
  • आवेदक की आय सीमित होना आवश्यक है और वह स्वयं खर्च वहन करने में असमर्थ होना चाहिए।
  • आवेदन के साथ आय प्रमाण पत्र, चिकित्सा प्रमाण पत्र (यदि लागू हो), एवं अनुशंसा पत्र संलग्न करना आवश्यक होता है।
  • आवेदन का स्थानीय स्तर पर सत्यापन कर सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृति दी जाती है।

अपात्रता की स्थिति में—

  • आयकरदाता (Income Tax Payer) सामान्यतः पात्र नहीं होते।
  • शासकीय कर्मचारी या पेंशनभोगी (विशेष परिस्थिति को छोड़कर) अपात्र माने जाते हैं।
  • आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति, बड़े व्यापारी, उद्योगपति, बड़े किसान पात्र नहीं होते।

महत्वपूर्ण प्रावधान—

  • एक ही व्यक्ति को बार-बार या एक ही समय में दो बार सहायता देना नियम विरुद्ध माना जाता है।
  • सहायता वितरण में पारदर्शिता, निष्पक्षता और वास्तविक जरूरतमंदों को प्राथमिकता अनिवार्य है।
  • किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर जांच एवं कार्रवाई का प्रावधान होता है।

इन नियमों के आधार पर ही स्वेच्छानुदान राशि का वितरण किया जाना चाहिए, ताकि योजना का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच सके।

मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला मामला—गणेश सिन्हा

इस पूरे विवाद के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया है। छुरा नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक 03 आवास पारा निवासी गणेश सिन्हा (पिता दुजराम सिन्हा) ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। उनका इलाज रायपुर स्थित सहज हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर में मार्च 2024 से चल रहा है। आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने क्षेत्रीय विधायक रोहित साहू से सहायता की अपील की थी। विधायक द्वारा मुख्यमंत्री के नाम से अनुशंसा पत्र भी भेजा गया, लेकिन आज तक उन्हें कोई आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई। यह घटना इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा मानवीय प्रश्न खड़ा करती है—क्या योजना का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

तहसीलदार का बयान—जिम्मेदारी कलेक्टर कार्यालय पर

मामले में जब छुरा तहसीलदार मयंक अग्रवाल से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि आपके द्वारा भेजा गया स्वेच्छानुदान राशि का पीडीएफ कलेक्टर कार्यालय से संबंधित है। इस संबंध में सटीक जानकारी वहीं से प्राप्त की जा सकती है, क्योंकि पत्र वहीं से जारी हुआ होगा। इस बयान के बाद अब पूरे मामले की जवाबदेही कलेक्टर कार्यालय पर केंद्रित हो गई है।

भाजपा के अंदर भी नाराज़गी

चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा के ही कुछ स्थानीय नेताओं ने इस सूची पर नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि यह योजना बीपीएल और गरीब वर्ग के लिए है, लेकिन यदि संपन्न लोगों को लाभ दिया जा रहा है तो यह निंदनीय है और इससे पार्टी की छवि धूमिल हो रही है।

राजनीतिक घमासान तेज—विपक्ष हमलावर

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा पहले कांग्रेस शासन में योजनाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाती थी, लेकिन अब खुद वही काम कर रही है। यह भी सवाल उठ रहा है कि स्वेच्छानुदान राशि की अनुशंसा आखिर किस स्तर से की गई—सांसद, विधायक या अन्य पदाधिकारी?

प्रशासन मौन, जांच की मांग तेज

पूरे मामले में अब तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन सामने नहीं आया है। इससे लोगों में शंकाएं और बढ़ गई हैं। सामाजिक संगठनों, आम नागरिकों और राजनीतिक दलों ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल

पूरा विवाद अब केवल एक वायरल सूची तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।

यदि जरूरतमंदों को सहायता नहीं मिल रही और संपन्न वर्ग को लाभ दिया जा रहा है, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी विपरीत है।


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