ओडिशा सीमा से लगे चार गांवों में हाथियों का उत्पात, कच्चे मकान क्षतिग्रस्त; घर छोड़कर आंगनबाड़ी और स्कूलों में शरण ले रहे ग्रामीण
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। जंगल से लगे गांवों में जब रात का सन्नाटा गहराता है, तब ग्रामीणों की चिंता और बढ़ जाती है। खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाने के बाद अब हाथियों का झुंड बस्तियों तक पहुंच रहा है। जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर ओडिशा सीमा से लगे आदिवासी बाहुल्य गांवों में इन दिनों करीब 35 हाथियों के दल की मौजूदगी ने ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि कई परिवार अपने ही घरों में रात बिताने से डर रहे हैं और सुरक्षित स्थानों की तलाश में आंगनबाड़ी केंद्रों तथा स्कूलों की पक्की छतों के नीचे शरण लेने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, पिछले एक सप्ताह से हाथियों का झुंड क्षेत्र में लगातार उत्पात मचा रहा है। शुरुआत में हाथियों ने किसानों की खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन अब कच्चे मकानों को भी निशाना बनाया जा रहा है। घरों को नुकसान पहुंचने और हाथियों के हमले की आशंका ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सबसे ज्यादा चिंता उन परिवारों को लेकर है, जिनके पास सुरक्षित और पक्के आवास की सुविधा नहीं है।

चार गांवों में भय का माहौल, रातभर पहरेदारी
ओडिशा सीमा से लगे आमामोरा, हथोड़ाडीही, कुकरार और अमलोर गांवों में हाथियों की आवाजाही से दहशत का माहौल है। इन गांवों में कमार और भुंजिया जनजाति के परिवार निवास करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, हाथियों का दल लगातार बस्तियों की ओर पहुंच रहा है, जिससे फसलों के साथ घरों को भी नुकसान हो रहा है।
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कच्चे मकानों में रहने वाले कई परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के अन्य सदस्यों की सुरक्षा का है। घर टूटने और अचानक हाथियों के सामने आ जाने की आशंका के चलते कुछ परिवारों को आंगनबाड़ी केंद्रों और स्कूलों की पक्की छतों के नीचे रात गुजारनी पड़ रही है। वहीं, कई ग्रामीण रातभर जागकर आसपास की गतिविधियों पर नजर रखने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों की लगातार मौजूदगी ने रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर दिया है। खेतों में जाना, घरों से बाहर निकलना और रात के समय सुरक्षित रहना बड़ी चुनौती बन गया है।
हाथियों को रोकने घरों के बाहर जला रहे आग
हाथियों को बस्ती से दूर रखने के लिए ग्रामीण अपने स्तर पर भी जतन कर रहे हैं। रात के समय घरों के बाहर लकड़ियां एकत्र कर आग जलाई जा रही है, ताकि हाथी घरों की ओर न बढ़ें। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद ग्रामीणों की चिंता कम नहीं हो रही है। हाथियों के झुंड के सामने स्थानीय स्तर पर किए जा रहे उपाय कितने कारगर होंगे, इसे लेकर भी संशय बना हुआ है।
विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक, हाथियों को देखकर उनके नजदीक जाना, उन्हें घेरना, छेड़ना या डराकर भगाने की कोशिश करना जानलेवा साबित हो सकता है। ग्रामीणों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने और वन विभाग के निर्देशों का पालन करने की जरूरत है।

वन विभाग की गश्त जारी, टॉर्च से रखी जा रही निगरानी
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के डीएफओ वरुण जैन ने बताया कि प्रभावित क्षेत्र में वन विभाग की टीम लगातार तैनात है और गश्त कर रही है। टॉर्च की रोशनी की मदद से हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है तथा उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस जंगल की ओर ले जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
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डीएफओ के अनुसार हाथियों को भगाने के लिए पटाखों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, क्योंकि इससे झुंड उत्तेजित हो सकता है और स्थिति ज्यादा खतरनाक बन सकती है। उन्होंने प्रभावित परिवारों को हुए नुकसान का सर्वे कराने के बाद नियमानुसार मुआवजा देने की बात कही है।
फसल और मकान के नुकसान के बीच सुरक्षा की चिंता
ओडिशा से लगे वन क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही के चलते मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति बनती रही है। ऐसे में समय पर सूचना, वन विभाग की सक्रिय निगरानी और प्रभावित गांवों में सतर्कता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीणों के लिए केवल फसल का नुकसान ही चिंता नहीं है, बल्कि घरों की सुरक्षा और परिवार की जान बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया है।
वन विभाग की ओर से ग्रामीणों से अपील की गई है कि हाथियों के करीब न जाएं, उन्हें घेरने या भगाने की कोशिश न करें और उनकी मौजूदगी की सूचना तत्काल वन विभाग को दें। विशेषकर रात के समय अकेले बाहर निकलने से बचें तथा बच्चों और बुजुर्गों को सुरक्षित स्थान पर रखें।
फिलहाल आमामोरा, हथोड़ाडीही, कुकरार और अमलोर के प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि हाथियों का झुंड कब बस्तियों से दूर होगा और वे कब फिर से अपने घरों में बेखौफ रात गुजार सकेंगे। वन विभाग की निगरानी और सुरक्षा प्रयासों के बीच अब ग्रामीणों को राहत का इंतजार है।





