कमार जनजाति की शासकीय पट्टे की जमीन के नामांतरण और कथित बिक्री पर शिकायत, पंचायतों में फर्मों के जरिए विकास राशि के भुगतान की भी जांच की उठी मांग
छुरा (गंगा प्रकाश)। जमीन के कागजों में नाम कैसे बदला और पंचायतों की विकास राशि आखिर किनके खातों तक पहुंच रही है? गरियाबंद जिले में सामने आए दो अलग-अलग मामलों ने राजस्व अभिलेखों से लेकर पंचायतों के वित्तीय लेन-देन तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मामले में विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय से जुड़े परिवार की शासकीय पट्टे की जमीन के हस्तांतरण पर सवाल है, तो दूसरे में पंचायतों की विकास राशि के कथित भुगतान को लेकर सचिवों और फर्मों की भूमिका चर्चा में है।
ग्राम आसरा, तहसील छुरा निवासी बुधराम ने कलेक्टर को आवेदन सौंपकर अपने चाचा बिसराम को शासन से प्राप्त भूमि के नामांतरण और कथित रजिस्ट्री की जांच की मांग की है। आवेदन के अनुसार, बिसराम को वर्ष 1995-96 में शासकीय पट्टा मिला था। खसरा नंबर 578/2, रकबा 1.37 हेक्टेयर भूमि पर बिसराम खेती-किसानी करते थे। चाचा की मृत्यु के बाद से स्वयं जमीन पर काबिज होकर खेती करने का दावा करने वाले बुधराम का आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में भूमि का नाम बदलकर दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज कर दिया गया।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, भूमि पहले बिसराम के नाम दर्ज थी, लेकिन बाद में तिलकराम ध्रुव, निवासी ग्राम जेंजर, तहसील राजिम के नाम दर्ज होने की जानकारी मिली। आवेदन में बिसराम की पत्नी फूलमत बाई द्वारा अपने दूसरे पति उज्ज्वल कुमार के पक्ष में जमीन की बिक्री से संबंधित रजिस्ट्री कराए जाने की बात भी कही गई है। शिकायत में 26 अप्रैल 2026 को फौत दर्ज कराकर फूलमत बाई का नाम भूमि स्वामी के रूप में दर्ज कराने तथा बिक्री पत्र के गवाहों और कथित जमीन दलालों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
👉 जरूर पढ़ें : चीन में दर्ज मकड़ी का गरियाबंद के जंगलों में मिला सुराग! भारत में पहली बार हुई ‘Mangora baii’ की पहचान
बुधराम ने भूमि की रजिस्ट्री निरस्त अथवा विधि अनुसार अमान्य घोषित करने, नामांतरण और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर कार्रवाई करने की मांग की है। हालांकि, जमीन के स्वामित्व, उत्तराधिकार, पट्टे की शर्तों और हस्तांतरण की वैधानिकता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

इधर, गरियाबंद विकासखंड की कुछ ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की राशि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ पंचायत सचिव स्वयं अथवा परिजनों के नाम पर फर्म बनाकर पंचायतों से भुगतान करा रहे हैं। फर्मों के जीएसटी नंबर के उपयोग और कथित आर्थिक लाभ की चर्चा के बीच वास्तविक लेन-देन की पुष्टि होना बाकी है।
इस मामले में पंचायत प्रस्ताव, कार्यादेश, बिल-वाउचर, बैंक खातों में हुए भुगतान, फर्मों के पंजीयन और वास्तविक निर्माण कार्यों का मिलान जरूरी है। यह भी जांच का विषय है कि भुगतान किसकी स्वीकृति से हुए और संबंधित फर्मों ने वास्तव में सामग्री की आपूर्ति या कार्य किया अथवा नहीं।
👉 जरूर पढ़ें – जंगल में आखिर क्या हुआ? उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दो मादा लंगूरों के शिकार का खुलासा, 3 गिरफ्तार
दोनों मामले अलग-अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही सवाल है—सरकारी व्यवस्था में दर्ज कागज और जमीन पर मौजूद हकीकत का मिलान कौन करेगा? फिलहाल दोनों प्रकरणों में लगाए गए आरोप जांच के अधीन होने योग्य हैं, दोष सिद्ध नहीं। अब प्रशासनिक जांच से ही स्पष्ट होगा कि कहीं नियमों की अनदेखी हुई है या नहीं और यदि हुई है, तो जिम्मेदारी किसकी बनती है।





