नेताओं और अफसरों की जुबानी जंग ने खोली व्यवस्था की पोल
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। प्रदेश सरकार द्वारा आम जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान और प्रशासन को गांव-गांव तक पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू किया गया “सुशासन तिहार” अब विवादों और राजनीतिक टकराव के कारण सवालों के घेरे में आ गया है। जिस अभियान को शासन और जनता के बीच भरोसे की मजबूत कड़ी माना जा रहा था, वही अब कई स्थानों पर नेताओं और अधिकारियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और सार्वजनिक बयानबाजी का मंच बनता दिखाई दे रहा है।
सुशासन तिहार के दौरान सामने आ रही घटनाओं ने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जनता के बीच भी इस अभियान की गंभीरता को लेकर संशय पैदा कर दिया है। कहीं जनप्रतिनिधियों द्वारा अधिकारियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही हैं, तो कहीं प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक प्रतिनिधि खुले मंचों पर एक-दूसरे की कार्यशैली पर सवाल उठाते नजर आ रहे हैं। इससे पूरे अभियान की मंशा पर बहस तेज हो गई है।

गांव-गांव शिविर, लेकिन समाधान अधूरा
सुशासन तिहार के तहत जिलेभर में शिविर आयोजित कर लोगों से आवेदन लिए जा रहे हैं। मंच सज रहे हैं, अधिकारी पहुंच रहे हैं और योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि वास्तविक समस्याओं का समाधान अब भी नहीं हो पा रहा है।
राशन कार्ड, प्रधानमंत्री आवास, भूमि पट्टा, सीमांकन, सड़क, पेयजल, बिजली, पेंशन और रोजगार जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर लोग महीनों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आवेदन जमा करने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही, जबकि जिम्मेदार अधिकारी कई बार संपर्क तक नहीं करते।
कई गांवों में लोगों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सुशासन तिहार केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। शिविरों में समस्याएं सुनी तो जा रही हैं, लेकिन समाधान धरातल पर नजर नहीं आ रहा।
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राजनीतिक बयानबाजी से बिगड़ रहा माहौल
सुशासन तिहार के दौरान लगातार बढ़ रही बयानबाजी ने पूरे माहौल को राजनीतिक रंग दे दिया है। सार्वजनिक मंचों पर नेताओं और अधिकारियों के बीच तल्ख टिप्पणियां अब आम होती जा रही हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीरता प्रभावित हो रही है और जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है।
लोगों का कहना है कि जब शासन और प्रशासन के जिम्मेदार लोग ही एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाएंगे, तो आम जनता आखिर किस पर भरोसा करे। कई स्थानों पर यह चर्चा भी तेज है कि जनसमस्याओं के समाधान की बजाय राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा दिखाई दे रही है।

विपक्ष को मिला सरकार पर हमला करने का मौका
सुशासन तिहार में बढ़ते विवादों ने विपक्ष को भी सरकार को घेरने का बड़ा मुद्दा दे दिया है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि सरकार केवल प्रचार-प्रसार में व्यस्त है, जबकि जमीनी स्तर पर लोगों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
विपक्ष का कहना है कि यदि प्रशासनिक शिविरों के बावजूद लोगों को राहत नहीं मिल रही, तो ऐसे अभियानों का औचित्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
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जनता में बढ़ रही नाराजगी
ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर नगरीय इलाकों तक अब लोगों के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि “सुशासन तिहार” समस्या समाधान से ज्यादा दिखावे का माध्यम बन गया है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते शिकायतों का निराकरण नहीं हुआ और जिम्मेदारों की बयानबाजी पर रोक नहीं लगी, तो यह अभियान सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या “सुशासन तिहार” वास्तव में जनता की समस्याओं का समाधान कर पाएगा या फिर शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती खींचतान का प्रतीक बनकर रह जाएगा।




