कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी विषय के प्रश्नपत्रों की पीडीएफ प्रसारित, शिक्षा विभाग की गोपनीय व्यवस्था पर उठे सवाल
प्रकाश कुमार यादव
छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों की तिमाही परीक्षाएं 21 सितंबर से शुरू होने जा रही हैं। परीक्षा के पहले दिन हिंदी विषय की परीक्षा होना बताया जा रहा है। इसी बीच परीक्षा शुरू होने से महज दो दिन पहले शनिवार 19 सितंबर की सुबह करीब 10 बजे कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी विषय के प्रश्नपत्रों की पीडीएफ फाइल सोशल मीडिया पर प्रसारित होने का मामला सामने आया है। एक साथ अलग-अलग कक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सोशल मीडिया पर पहुंचने से शिक्षा विभाग की प्रश्नपत्र तैयार करने, सुरक्षित रखने, प्रिंटिंग कराने और विद्यालयों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गोपनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर कक्षा पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं के हिंदी विषय के प्रश्नपत्रों की पीडीएफ फाइल प्रसारित हुई। इन प्रश्नपत्रों को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। यदि प्रसारित किए गए प्रश्नपत्र वही हैं, जिन्हें 21 सितंबर को होने वाली तिमाही परीक्षा में विद्यार्थियों को वितरित किया जाना है, तो मामला परीक्षा की गोपनीयता और निष्पक्षता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। हालांकि, समाचार लिखे जाने तक शिक्षा विभाग की ओर से वायरल प्रश्नपत्रों के वास्तविक परीक्षा प्रश्नपत्र होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र सामने आने से बढ़ी चिंता
प्राथमिक कक्षाओं की तिमाही परीक्षा में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शामिल होने वाले हैं। ऐसे में परीक्षा से दो दिन पहले ही प्रश्नपत्रों की डिजिटल प्रति सोशल मीडिया पर पहुंचना कई सवाल खड़े करता है। प्रश्नपत्र चाहे वास्तविक परीक्षा के हों अथवा किसी सामान्य टेस्ट के लिए तैयार किए गए हों, उनकी डिजिटल प्रति का सार्वजनिक सोशल मीडिया समूहों तक पहुंचना विभागीय गोपनीयता व्यवस्था की समीक्षा का विषय जरूर बन गया है।
विशेष रूप से तब, जब एक साथ कक्षा पहली से पांचवीं तक के हिंदी विषय के प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित होने की बात सामने आई है। इससे यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रश्नपत्रों की प्रतियां किन-किन स्तरों पर उपलब्ध थीं और किस माध्यम से उनकी पीडीएफ सोशल मीडिया तक पहुंची।

जिला स्तर के अधिकारियों से संपर्क का प्रयास
मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी राजेश साहू तथा जिला समन्वयक, समग्र शिक्षा, गरियाबंद शिवेश शुक्ला से फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया। हालांकि, फोन पर संपर्क नहीं हो सका। इसके बाद दोनों अधिकारियों के व्हाट्सऐप नंबर पर वायरल प्रश्नपत्र का स्क्रीनशॉट भेजकर पूरे मामले में उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। लेकिन खबर लिखे जाने तक दोनों अधिकारियों की ओर से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
ऐसे में विभाग के जिला स्तर के अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आने के कारण वायरल प्रश्नपत्रों की वास्तविकता को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने बताया—सामान्य टेस्ट है
इधर शनिवार शाम करीब चार बजे सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी विनोद सिन्हा ने फोन कर मामले में विभाग का पक्ष बताया। उन्होंने कहा कि जिला शिक्षा अधिकारी राजेश साहू ने उन्हें फोन पर हिंदी दैनिक समाचार पत्र गंगा प्रकाश की टीम से बात कर स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा है।
श्री सिन्हा के अनुसार यह कोई नियमित बोर्ड अथवा बड़ी परीक्षा नहीं, बल्कि सामान्य टेस्ट है। उन्होंने बताया कि समन्वयक द्वारा किसी व्यक्ति अथवा संबंधित स्तर को प्रश्नपत्र प्रिंटिंग के लिए उपलब्ध कराया गया होगा और वहीं से उसकी पीडीएफ सोशल मीडिया पर प्रसारित हो गई। उन्होंने इसे गंभीर विषय नहीं बताया।
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हालांकि विभागीय अधिकारी के इस स्पष्टीकरण के बाद भी प्रश्नपत्रों की गोपनीयता को लेकर कई सवाल बरकरार हैं। यदि प्रश्नपत्र केवल सामान्य टेस्ट के लिए तैयार किए गए थे और प्रिंटिंग के लिए उपलब्ध कराए गए थे, तो परीक्षा से दो दिन पहले उनकी पीडीएफ सोशल मीडिया पर किस माध्यम से पहुंची? क्या प्रिंटिंग के लिए उपलब्ध कराई गई डिजिटल फाइल को सुरक्षित रखने की कोई व्यवस्था थी? क्या संबंधित व्यक्ति या संस्था के स्तर पर डिजिटल फाइल की सुरक्षा सुनिश्चित की गई थी? इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
प्रश्नपत्र वायरल होने की पूरी प्रक्रिया जांच के दायरे में
इस पूरे मामले में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उसकी पहली डिजिटल प्रति किस अधिकारी या कर्मचारी के पास थी। इसके बाद उसे प्रिंटिंग के लिए किसे भेजा गया, किस माध्यम से भेजा गया और प्रिंटिंग के बाद डिजिटल फाइल को किस प्रकार सुरक्षित रखा गया।
यदि प्रश्नपत्र किसी व्हाट्सऐप ग्रुप, ई-मेल या अन्य डिजिटल माध्यम से भेजा गया था तो उस प्रक्रिया की भी जांच की जा सकती है। साथ ही यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि क्या संबंधित फाइल किसी अन्य व्यक्ति तक पहुंची थी या नहीं।
प्रश्नपत्र की गोपनीयता केवल परीक्षा के दिन तक सीमित नहीं होती। परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने की स्थिति में विद्यार्थियों के बीच असमानता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में वायरल दस्तावेज वास्तविक परीक्षा प्रश्नपत्र हैं या नहीं, इसकी समय रहते पुष्टि करना आवश्यक माना जा रहा है।
दुल्ला संकुल स्तर से वायरल होने की चर्चा
प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आई कि छुरा ब्लॉक के दुल्ला संकुल स्तर से प्रश्नपत्र प्रिंटिंग अथवा अन्य प्रक्रिया के लिए उपलब्ध कराया गया होगा और वहीं से इसकी पीडीएफ सोशल मीडिया तक पहुंची।
हालांकि, यह केवल स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चा है। शिक्षा विभाग ने अब तक किसी व्यक्ति, कर्मचारी, संकुल या संस्था को प्रश्नपत्र वायरल करने के लिए जिम्मेदार नहीं बताया है। इसलिए जब तक विभागीय स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं होती, तब तक किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
फिर भी यदि वायरल प्रश्नपत्र वास्तविक पाए जाते हैं, तो दुल्ला संकुल सहित प्रश्नपत्र की प्रक्रिया से जुड़े सभी स्तरों की जांच किए जाने की आवश्यकता होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रश्नपत्र किस स्तर से बाहर आया।

यदि प्रश्नपत्र वही निकले तो क्या होगा?
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित प्रश्नपत्र और 21 सितंबर को विद्यार्थियों को दिए जाने वाले प्रश्नपत्रों का मिलान किया जाए। यदि दोनों अलग पाए जाते हैं तो वायरल दस्तावेजों को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि दोनों प्रश्नपत्र एक जैसे पाए जाते हैं, तो यह परीक्षा की गोपनीयता से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक प्रश्न बन जाएगा।
ऐसी स्थिति में यह भी देखा जाना जरूरी होगा कि प्रश्नपत्र पहले से कितने लोगों के पास उपलब्ध था, उसकी सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था निर्धारित थी और निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
शिक्षकों और अभिभावकों में भी चर्चा
प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित होने की खबर सामने आने के बाद शिक्षकों और अभिभावकों के बीच भी इसकी चर्चा होने लगी है। कई लोगों का सवाल है कि यदि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र विद्यार्थियों या अन्य लोगों तक पहुंच जाता है तो परीक्षा का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
दूसरी ओर विभागीय अधिकारी इसे सामान्य टेस्ट बताते हैं। ऐसे में अब विभाग की ओर से स्पष्ट किया जाना जरूरी हो गया है कि 21 सितंबर को होने वाली परीक्षा के लिए कौन-सा प्रश्नपत्र निर्धारित है और सोशल मीडिया पर प्रसारित पीडीएफ उसी परीक्षा से संबंधित है या नहीं।
विभागीय जांच से ही सामने आएगी वास्तविकता
फिलहाल मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं है। सोशल मीडिया पर प्रसारित प्रश्नपत्रों की सत्यता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही विभाग ने किसी व्यक्ति या संस्था को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। इसलिए वायरल प्रश्नपत्र को सीधे परीक्षा प्रश्नपत्र मान लेना भी उचित नहीं होगा।
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लेकिन परीक्षा से ठीक दो दिन पहले कक्षा पहली से पांचवीं तक के हिंदी विषय के प्रश्नपत्रों की पीडीएफ का सोशल मीडिया पर पहुंचना अपने आप में विभाग की प्रश्नपत्र प्रबंधन व्यवस्था की समीक्षा का विषय जरूर है।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले में वायरल दस्तावेजों का आधिकारिक सत्यापन करता है या नहीं और यदि प्रश्नपत्र वास्तविक पाए जाते हैं तो इसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है—21 सितंबर की तिमाही परीक्षा से दो दिन पहले पांच कक्षाओं के हिंदी विषय के प्रश्नपत्रों की पीडीएफ सोशल मीडिया तक कैसे पहुंची और क्या वायरल हुए प्रश्नपत्र ही परीक्षा में विद्यार्थियों को वितरित किए जाने हैं? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर विभागीय जांच और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही सामने आ सकेगा।





