जिला शिक्षा अधिकारी के आश्वासन के बाद भी नहीं मिली पूरी सूचना, विभागीय अभिलेखों और वास्तविक स्थिति में अंतर ने खड़े किए कई गंभीर सवाल
यदिन्द्रन नायर
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। जिले में निजी विद्यालयों के संचालन को लेकर सामने आए एक मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, अभिलेख संधारण, निरीक्षण व्यवस्था और सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों, भवन स्वामी के कथन तथा मीडिया द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन से जो तथ्य सामने आए हैं, वे यह संकेत देते हैं कि विभागीय रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर हो सकता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल एक विद्यालय का मामला नहीं बल्कि विभागीय निगरानी व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन जाता है।
मामले का केंद्र बीजापुर स्थित आदेश्वर पब्लिक स्कूल है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार जिला शिक्षा कार्यालय के अभिलेखों में विद्यालय का संचालन आज भी दीनदयाल उपाध्याय वार्ड क्रमांक-02 स्थित भवन से दर्ज है। यह वही भवन है जहां विद्यालय वर्ष 2016 तक संचालित होने का उल्लेख मिलता है। लेकिन संबंधित भवन के स्वामी पवन ठाकुर ने बताया कि विद्यालय संचालक वर्ष 2016 में ही भवन खाली कर चुके थे और उसके बाद से विद्यालय उस परिसर में संचालित नहीं हो रहा है।
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इधर, मीडिया प्रतिनिधि द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन में पाया गया कि विद्यालय वर्तमान में वार्ड क्रमांक-03, विद्या हल्बा पारा, तुमनार रोड, बीजापुर स्थित दूसरे भवन में संचालित हो रहा है। यदि विभागीय रिकॉर्ड में आज भी पुराना पता दर्ज है और वास्तविक संचालन किसी अन्य परिसर से हो रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतने वर्षों तक विभागीय रिकॉर्ड अद्यतन क्यों नहीं किए गए।
आरटीआई से खुला पूरा मामला
इस पूरे प्रकरण को सामने लाने में आरटीआई एवं आरटीआई कार्यकर्ता यदिन्द्रन नायर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जिला शिक्षा कार्यालय से विद्यालय से संबंधित जानकारी मांगी। विभाग से प्राप्त दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद जब उन्होंने भवन स्वामी से संपर्क किया तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई।
भवन मालिक पवन ठाकुर ने बताया कि विद्यालय लगभग दस वर्ष पहले ही भवन खाली कर चुका है। इसके बाद जब मीडिया प्रतिनिधि ने मौके पर जाकर स्थिति का सत्यापन किया तो विद्यालय दूसरे स्थान पर संचालित मिला। इस प्रकार विभागीय रिकॉर्ड, भवन स्वामी का कथन और मौके की वास्तविक स्थिति—तीनों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
डीईओ ने दिया आश्वासन, फिर कहा अपील करें
आरटीआई कार्यकर्ता यदिन्द्रन नायर का आरोप है कि विभाग द्वारा उन्हें मांगी गई पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। अधूरी सूचना मिलने के बाद उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी राजेश पांडेय से संपर्क किया।
उनके अनुसार जिला शिक्षा अधिकारी ने मौखिक रूप से लगभग दस दिनों में संपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। लेकिन निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। बाद में पुनः संपर्क करने पर उन्हें कथित रूप से यह कहकर लौटा दिया गया कि यदि जानकारी चाहिए तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्रथम अपील प्रस्तुत करें।
यहीं से कई नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं। यदि अधिकारी स्वयं जानकारी उपलब्ध कराने का आश्वासन दे चुके थे, तो बाद में अपील करने की सलाह क्यों दी गई? यदि सूचना उपलब्ध थी तो समय पर क्यों नहीं दी गई? और यदि सूचना उपलब्ध नहीं थी, तो इसका कारण क्या था?
क्या आरटीआई अधिनियम की भावना का पालन हुआ?
सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यदि कोई नागरिक नियमानुसार आवेदन प्रस्तुत करता है तो उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध कराना संबंधित लोक सूचना अधिकारी का दायित्व होता है।
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ऐसे में यदि आवेदक को पहले आश्वासन दिया जाए और बाद में अपील करने के लिए कहा जाए, तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल खड़ा करता है कि आखिर सूचना उपलब्ध कराने में विलंब क्यों हुआ। यह विषय भी जांच के दायरे में आने योग्य माना जा रहा है।
रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर क्यों?
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विभागीय रिकॉर्ड और वास्तविक संचालन स्थल के बीच दिखाई दे रहा अंतर है।
- यदि विद्यालय ने वर्ष 2016 में भवन बदल लिया था, तो क्या इसकी जानकारी विभाग को दी गई थी?
- यदि जानकारी दी गई थी तो रिकॉर्ड में संशोधन क्यों नहीं किया गया?
- यदि जानकारी नहीं दी गई थी तो विभागीय निरीक्षण के दौरान यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया?
- क्या वर्षों तक निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहे?
- क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया?
इन प्रश्नों का उत्तर विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन फिलहाल उपलब्ध तथ्यों ने पूरी व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
भवन सुरक्षा का विषय भी गंभीर
विद्यालय संचालन केवल मान्यता प्राप्त करने तक सीमित नहीं होता। प्रत्येक निजी विद्यालय के लिए भवन की मजबूती, स्वीकृत ब्लूप्रिंट, भूमि संबंधी अभिलेख, भवन स्वामित्व अथवा वैध किरायानामा, अग्निशमन सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, आपदा प्रबंधन सहित अनेक मानकों का पालन अनिवार्य होता है।
यदि विद्यालय वास्तव में किसी दूसरे भवन में संचालित हो रहा है और विभागीय रिकॉर्ड में उसका उल्लेख नहीं है, तो यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान भवन का निरीक्षण कब किया गया, उसके दस्तावेज विभाग के पास उपलब्ध हैं या नहीं और विद्यार्थियों की सुरक्षा के सभी मानकों का पालन हो रहा है या नहीं।
केवल एक विद्यालय नहीं, पूरे जिले की जांच जरूरी
जानकारों का कहना है कि यदि एक विद्यालय के मामले में रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में इतना बड़ा अंतर सामने आया है तो पूरे जिले में संचालित निजी विद्यालयों की जांच आवश्यक हो जाती है।
जांच में निम्न बिंदुओं का भौतिक सत्यापन किया जाना चाहिए—
- विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज पता।
- वास्तविक संचालन स्थल।
- संचालन स्थल परिवर्तन की विधिक अनुमति।
- भवन का स्वीकृत नक्शा।
- भूमि एवं भवन संबंधी दस्तावेज।
- वैध किरायानामा अथवा स्वामित्व प्रमाण।
- अग्निशमन सुरक्षा प्रमाणपत्र।
- भवन की संरचनात्मक सुरक्षा।
- मान्यता से संबंधित समस्त अभिलेख।
यदि किसी भी विद्यालय में रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
शिक्षा विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
यह पूरा घटनाक्रम जिला शिक्षा विभाग की निगरानी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहा है। यदि विभाग के रिकॉर्ड में वर्षों तक पुराना पता बना रहा और वास्तविक संचालन किसी दूसरे स्थान से होता रहा, तो निरीक्षण प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हर वर्ष विद्यालयों के संबंध में विभिन्न प्रकार की प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी होती हैं। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि क्या इन प्रक्रियाओं के दौरान वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया गया था या नहीं।
डीईओ ने बैठक बुलाने की कही बात
पूरे मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी राजेश पांडेय ने कहा कि जल्द ही जिले के निजी विद्यालय संचालकों की बैठक बुलाई जाएगी। बैठक में विद्यालय संचालन से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की जाएगी तथा आवश्यक जानकारी एकत्रित कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, यह भी अपेक्षा की जा रही है कि केवल बैठक तक मामला सीमित न रहे, बल्कि रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच यदि कोई अंतर है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर आवश्यक सुधारात्मक कदम भी उठाए जाएं।
पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता
शिक्षा व्यवस्था समाज की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक है। अभिभावक अपने बच्चों को इस विश्वास के साथ विद्यालय भेजते हैं कि वहां सभी आवश्यक नियमों का पालन किया जा रहा होगा। यदि विभागीय अभिलेख ही वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते, तो यह चिंता का विषय है।
इस मामले में आवश्यक है कि जिला प्रशासन एवं शिक्षा विभाग पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर स्पष्ट करें कि रिकॉर्ड अद्यतन क्यों नहीं हुए, आरटीआई आवेदक को समय पर पूरी सूचना क्यों नहीं मिली, वास्तविक संचालन स्थल की जानकारी विभागीय अभिलेखों में क्यों परिलक्षित नहीं हुई और यदि कहीं विभागीय स्तर पर चूक हुई है तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित पक्षों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल
यदि विभागीय रिकॉर्ड आज भी वर्ष 2016 से पहले वाले पते को दर्शा रहे हैं, भवन स्वामी उस परिसर को दस वर्ष पहले खाली कराया जाना बता रहे हैं और मीडिया के भौतिक सत्यापन में विद्यालय किसी अन्य भवन में संचालित मिला है, तो आखिर पिछले दस वर्षों से जिला शिक्षा विभाग के निरीक्षण, सत्यापन और अभिलेख अद्यतन की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित होती रही?
विद्यालय प्रबंधन का पक्ष नहीं मिल सका
समाचार प्रकाशित करने से पूर्व विद्यालय प्रबंधन का पक्ष जानने के उद्देश्य से स्कूल संचालक से उनके मोबाइल नंबर पर कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया। हालांकि, उन्होंने किसी भी कॉल का उत्तर नहीं दिया। इसके बाद भी उनकी ओर से न तो वापस कॉल किया गया और न ही किसी माध्यम से कोई प्रतिक्रिया दी गई। यदि विद्यालय प्रबंधन भविष्य में अपना पक्ष प्रस्तुत करता है, तो उसे भी प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।
