गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। जिस रास्ते से किसी बच्चे को स्कूल तक पहुंचकर अपने भविष्य की इबारत लिखनी चाहिए, उसी रास्ते में यहां 20 फीट ऊंची सीढ़ी उसकी परीक्षा ले रही है। देहारगुड़ा में अधूरे पड़े पुल के ऊपर से स्कूली बच्चे रोजाना जान जोखिम में डालकर आवागमन कर रहे हैं। किसी के हाथ में किताबें हैं तो किसी के कंधे पर स्कूल बैग, लेकिन कदम जिस रास्ते पर पड़ रहे हैं, वहां एक छोटी सी चूक भारी पड़ सकती है।
तीन साल से अधूरे पुल और बच्चों की इस जोखिम भरी आवाजाही का वीडियो सामने आने के बाद मामला केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है। आयोग की सक्रियता के बाद जिला प्रशासन भी हरकत में आया।

वीडियो ने खोली व्यवस्था की पोल
देहारगुड़ा में अधूरे पुल के कारण बच्चों को नदी पार करने के लिए अस्थायी व्यवस्था और ऊंची सीढ़ी का सहारा लेना पड़ रहा है। बारिश के दिनों में यह रास्ता और अधिक खतरनाक हो जाता है। बच्चों के इस जोखिम भरे सफर का वीडियो वायरल होने के बाद सवाल उठने लगा कि आखिर शिक्षा के मंदिर तक पहुंचने के लिए बच्चों को इतना बड़ा खतरा क्यों उठाना पड़ रहा है?
👉 जरूर पढ़ें- आखिर ऐसा क्या था इस झांकी में, जिसने पूरे सदन को झूमने पर कर दिया मजबूर?
मामले ने तूल पकड़ा तो शुक्रवार को कलेक्टर रणवीर शर्मा अधिकारियों के दल के साथ देहारगुड़ा पहुंचे। शिक्षा, राजस्व, सेतु शाखा सहित संबंधित विभागों के अधिकारियों की मौजूदगी में पुल का निरीक्षण किया गया। कलेक्टर ने खुद पुल पर चढ़कर मौके की स्थिति देखी और निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति का जायजा लिया।
कलेक्टर की सख्ती, पुल पर अब पहरा
निरीक्षण के बाद प्रशासन ने पुल स्थल की सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश जारी किए। निर्माण एजेंसी को बारिश थमते ही शेष कार्य तत्काल शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं।
साथ ही पुल पर 24 घंटे निगरानी के लिए छह सुरक्षा गार्ड तैनात करने, आम लोगों की आवाजाही रोकने और दोनों ओर चेतावनी बोर्ड लगाने को कहा गया है। चेतावनी बोर्ड 24 घंटे के भीतर लगाए जाने के निर्देश दिए गए हैं।
कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्माणाधीन पुल के कारण यदि कोई दुर्घटना होती है तो संबंधित निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की जिम्मेदारी तय की जाएगी। लापरवाही पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई के साथ एफआईआर की कार्रवाई भी की जा सकती है।

4.71 करोड़ का पुल, फिर भी इंतजार खत्म नहीं
देहारगुड़ा पुल के निर्माण के लिए नवंबर 2023 में 4.71 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। निर्माण कार्य 9 सितंबर 2024 से शुरू हुआ। जनवरी 2025 में पुल की नींव रखी गई, लेकिन विद्युत पोलों के स्थानांतरण के कारण काम प्रभावित हुआ।
👉 जरूर पढ़ें:हर साल नतीजों में दिखी मेहनत, 12 साल से नहीं टूटा रिकॉर्ड
मार्च 2025 में पोल हटाए जाने के बाद निर्माण ने गति पकड़ी, लेकिन अंतिम चरण में लगातार बारिश ने फिर काम रोक दिया। नतीजा यह रहा कि करोड़ों की लागत वाला पुल अब तक अधूरा है और ग्रामीणों के साथ स्कूली बच्चे भी परेशानी झेल रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों ने भी उठाए सवाल
निरीक्षण के दौरान क्षेत्रीय विधायक जनकराम ध्रुव मौजूद रहे। उन्होंने निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए पुल निर्माण जल्द पूरा कराने की मांग की। जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम ने भी निर्माण में देरी पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
अब सवाल सिर्फ पुल का नहीं, बच्चों की सुरक्षा का है
प्रशासन ने पुल को दिसंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच पूरा करने का लक्ष्य बताया है। लेकिन तब तक सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बच्चों को सुरक्षित रास्ता मिलेगा या वे इसी तरह 20 फीट की सीढ़ी पर अपने भविष्य का सफर तय करते रहेंगे?
NHRC के नोटिस के बाद अब इस मामले में राज्य सरकार को भी जवाब देना है। ऐसे में देहारगुड़ा का अधूरा पुल अब सिर्फ एक निर्माणाधीन परियोजना नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार की परीक्षा बन चुका है।





