छुरा/गरियाबंद(गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ में जहां एक ओर शासन खुद शहर से लेकर गांव तक देशी-विदेशी मदिरा दुकानों का संचालन कर राजस्व बढ़ाने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। छुरा थाना क्षेत्र में एक बार फिर अवैध शराब तस्करों की गिरफ्तारी ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने अलग-अलग दो प्रकरणों में 15 लीटर 120 एमएल अवैध देशी शराब के साथ दो आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है, लेकिन इस कार्रवाई से ज्यादा चर्चा अब उस ‘अदृश्य नेटवर्क’ की हो रही है, जो लगातार फल-फूल रहा है।

पुलिस के अनुसार, दोनों मामलों में आरोपियों के पास से देशी मसाला और प्लेन शराब जब्त की गई, जिसे मोटरसाइकिल के जरिए परिवहन किया जा रहा था। आबकारी एक्ट की धारा 34(2) के तहत अपराध दर्ज कर आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। कागजों में यह एक सामान्य कार्रवाई लग सकती है, लेकिन लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने कई गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार बेच रही शराब, फिर तस्करी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब छत्तीसगढ़ शासन खुद हर क्षेत्र में शराब की वैध दुकानों का संचालन कर रहा है, तो फिर अवैध शराब की इतनी बड़ी सप्लाई चेन आखिर कैसे सक्रिय है? गांव-गांव तक सरकारी दुकानें हैं, आबकारी विभाग की निगरानी है, संविदा कर्मचारी तैनात हैं—इसके बावजूद अवैध शराब की उपलब्धता यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं सिस्टम में बड़ी खामी है।

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कहां से आ रही अवैध शराब?

स्थानीय लोगों का मानना है कि यह अवैध शराब या तो बाहरी राज्यों से लाई जा रही है या फिर वैध दुकानों से ही किसी नेटवर्क के जरिए डायवर्ट की जा रही है। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि तस्कर छोटे-छोटे वाहनों या दोपहिया के जरिए गांवों तक शराब पहुंचाते हैं, जिससे वे आसानी से पुलिस की नजरों से बच सकें। छुरा में पकड़े गए दोनों आरोपी भी इसी पैटर्न पर काम करते नजर आए।

संरक्षण के बिना संभव नहीं बड़ा नेटवर्क

सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर यह अवैध कारोबार किसके संरक्षण में चल रहा है? क्योंकि बिना किसी मजबूत बैकअप या मिलीभगत के इस तरह का नेटवर्क लंबे समय तक संचालित होना लगभग असंभव है। जानकारों का कहना है कि तस्करों की लगातार गिरफ्तारी इस बात का संकेत है कि सिर्फ छोटे स्तर के लोग पकड़े जा रहे हैं, जबकि असली मास्टरमाइंड अब भी पकड़ से दूर हैं।

पुलिस की कार्रवाई बनाम सिस्टम की खामियां

यह भी सच है कि थाना छुरा पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है और तस्करों को पकड़ रही है, जो सराहनीय है। लेकिन सवाल यह भी है कि जब बार-बार एक ही तरह के मामले सामने आ रहे हैं, तो क्या केवल गिरफ्तारी ही पर्याप्त है? क्या यह कार्रवाई अवैध शराब के नेटवर्क को खत्म कर पा रही है, या फिर यह केवल सतही स्तर तक सीमित है?

आबकारी विभाग की भूमिका पर भी सवाल

शराब दुकानों के संचालन और नियंत्रण की जिम्मेदारी आबकारी विभाग के पास है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि अवैध शराब के मामलों में उनकी भूमिका पर भी सवाल उठें। क्या विभाग की निगरानी में कहीं चूक हो रही है, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका जवाब मिलना बेहद जरूरी है।

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जमीनी सच्चाई: गांवों में आसानी से उपलब्ध अवैध शराब

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां अवैध शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है, और कई बार यह सरकारी दुकानों से सस्ती भी होती है। यही कारण है कि लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं और तस्करों का नेटवर्क मजबूत होता जाता है।

अब क्या होना चाहिए?

जरूरत इस बात की है कि पुलिस, आबकारी विभाग और प्रशासन मिलकर एक संयुक्त अभियान चलाएं और अवैध शराब के पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करें। केवल छोटे तस्करों को पकड़ने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे छिपे बड़े गिरोह और संरक्षण देने वाले लोगों पर भी सख्त कार्रवाई करनी होगी।

छुरा की यह ताजा कार्रवाई भले ही कानून व्यवस्था के लिहाज से एक उपलब्धि हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सरकारी सिस्टम के समानांतर एक बड़ा अवैध नेटवर्क सक्रिय है। जब तक इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचकर उसे खत्म नहीं किया जाएगा।


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