सीमांकन की तारीख 10 अक्टूबर तय होने और शुल्क जमा करने के दावे के बीच निर्माण का आरोप; रात 11 बजे से तड़के 2 बजे तक चला काम, विरोध के बावजूद नहीं रुका निर्माण? राजनीतिक संरक्षण और ‘ऊपर तक पहुंच’ के धौंस को लेकर भी उठे सवाल
यदिंद्रन नायर
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। क्या बीजापुर में जमीन से जुड़े विवादों के बीच कथित भूमाफियाओं का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि अपनी भूमि की सुरक्षा के लिए आम नागरिकों को भी संघर्ष करना पड़ रहा है? क्या राजनीतिक संरक्षण और ऊंची पहुंच का कथित धौंस दिखाकर जमीनों पर अवैध अतिक्रमण की कोशिशें की जा रही हैं? जिले में सामने आया सोनसाय बाकड़े की भूमि से जुड़ा मामला ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी भूमि पर बिना सहमति और वैधानिक अधिकार के निर्माण कराया जा रहा है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि जब भूमि सीमांकन की तारीख निर्धारित हो चुकी थी और शुल्क जमा करने की बात कही जा रही है, तब कथित तौर पर रात के अंधेरे में निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया। भू-स्वामी की आपत्ति के बावजूद काम जारी रहने की शिकायत ने पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है।
बीजापुर निवासी सोनसाय बाकड़े, पिता स्वर्गीय रामचंद्र बाकड़े ने तहसीलदार बीजापुर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर अपनी भूमि के संबंध में शिकायत दर्ज कराई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने 21 सितंबर 2026 को आवेदन देकर भूमि पर कथित निर्माण को लेकर आपत्ति जताई और सीमांकन, स्थल निरीक्षण तथा सीमांकन तक स्थिति यथावत रखने की मांग की। शिकायतकर्ता ने आवेदन में खसरा नंबर 177/138 तथा रकबा 0.0200 हेक्टेयर का उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि संजय लूक्कड़ नामक व्यक्ति द्वारा उनकी भूमि पर बिना वैधानिक अधिकार के निर्माण कराया जा रहा है।
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शिकायतकर्ता स्वयं को अनुसूचित जनजाति वर्ग का बताते हैं और संबंधित भूमि पर अपना अधिकार होने का दावा करते हैं। भूमि की सीमाओं और वास्तविक स्थिति को स्पष्ट कराने के लिए उन्होंने राजस्व विभाग में सीमांकन का आवेदन दिया था। सीमांकन के लिए 10 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित होने तथा इसके लिए शुल्क जमा किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में भू-स्वामी को उम्मीद थी कि निर्धारित तिथि पर राजस्व अमला मौके पर पहुंचकर अभिलेखों के आधार पर भूमि की वास्तविक सीमा स्पष्ट करेगा। लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि सीमांकन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही विवादित भूमि पर निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया।

सीमांकन से लगभग दस दिन पहले रात में निर्माण कराने का आरोप
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू निर्माण कार्य के समय को लेकर है। शिकायतकर्ता के आरोप के अनुसार निर्धारित सीमांकन तिथि से लगभग 10 दिन पहले कथित तौर पर निर्माण कार्य शुरू कराया गया। उनका कहना है कि रात लगभग 11 बजे से तड़के 2 बजे तक निर्माण कार्य चलता रहा। भू-स्वामी का आरोप है कि उन्होंने निर्माण कार्य पर मौखिक आपत्ति जताई और काम रोकने का अनुरोध किया, इसके बावजूद कार्य जारी रहा।
यदि शिकायतकर्ता के इस आरोप की पुष्टि होती है, तो यह जांच का विषय होगा कि जब संबंधित भूमि की सीमाओं को लेकर विवाद और सीमांकन की प्रक्रिया मौजूद थी, तब निर्माण किस आधार पर कराया गया। क्या निर्माण कराने वाले पक्ष के पास भूमि पर अधिकार से संबंधित दस्तावेज थे? क्या संबंधित निर्माण के लिए किसी प्रकार की अनुमति आवश्यक थी? क्या राजस्व विभाग को निर्माण की जानकारी थी? और यदि जानकारी थी, तो क्या मौके की स्थिति दर्ज करने अथवा नियमानुसार कोई कदम उठाया गया?
किसान किताब में अलग खसरे, आवेदन में अलग नंबर; आखिर भूमि की वास्तविक पहचान क्या?
इस प्रकरण में दस्तावेजों के विवरण से एक महत्वपूर्ण पेचीदगी भी सामने आती है। शिकायत में खसरा नंबर 177/138 और रकबा 0.0200 हेक्टेयर का उल्लेख बताया गया है। वहीं किसान किताब क्रमांक 307856 में शिकायतकर्ता के नाम से खसरा नंबर 177/37 और 177/38 दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। दोनों खसरों का रकबा 0.020-0.020 हेक्टेयर बताया गया है।
दूसरी ओर राजस्व निरीक्षक वृत्त बीजापुर की एक पुरानी रिपोर्ट में खसरा नंबर 177/2 और रकबा 0.725 हेक्टेयर का उल्लेख मिलता है। ऐसे में तीन अलग-अलग राजस्व संदर्भों के बीच संबंध स्पष्ट होना बेहद जरूरी है।
क्या खसरा नंबर 177/138, 177/37, 177/38 और 177/2 एक ही मूल भूमि अथवा उसके अलग-अलग हिस्सों से संबंधित हैं? क्या खसरा विभाजन, बंटवारा, नामांतरण या किसी अन्य राजस्व प्रक्रिया के कारण नंबरों में अंतर आया है? क्या शिकायतकर्ता की भूमि उसी क्षेत्र में स्थित है, जहां वर्तमान निर्माण होने का आरोप लगाया गया है?
इन सवालों का जवाब प्रमाणित राजस्व अभिलेखों, खसरा पंचसाला, बी-1, किसान किताब, नक्शा, नामांतरण आदेश तथा विधिवत सीमांकन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। जब तक इन दस्तावेजों का मिलान नहीं होता, तब तक किसी एक खसरे को दूसरे का पर्याय मानना अथवा सभी को एक ही भूमि से जोड़ना उचित नहीं होगा।

राजस्व निरीक्षक की पुरानी रिपोर्ट भी जांच के दायरे में
उपलब्ध विवरण के अनुसार राजस्व निरीक्षक वृत्त बीजापुर की रिपोर्ट पत्र क्रमांक 123/रा.नि.मं./2024, दिनांक 9 सितंबर 2024 में खसरा नंबर 177/2, रकबा 0.725 हेक्टेयर के निरीक्षण एवं सीमांकन से संबंधित जानकारी दर्ज है।
बताई गई रिपोर्ट में मकान, आंगन, अन्य संरचनाओं, पक्के मकान तथा पक्की और सीसी सड़क जैसी स्थितियों का उल्लेख होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के विवरण में अलग-अलग हिस्सों में निर्माण एवं सड़क से संबंधित क्षेत्रफल का भी जिक्र बताया गया है। हालांकि, इन विवरणों का मूल रिपोर्ट, नक्शे और मौके की स्थिति से मिलान किया जाना आवश्यक है।
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अब सवाल यह है कि वर्ष 2024 में तैयार रिपोर्ट का वर्तमान विवाद से क्या संबंध है? क्या पुरानी रिपोर्ट में संबंधित भूमि की सीमा स्पष्ट की गई थी? क्या वर्तमान निर्माण उसी भूभाग में हो रहा है? क्या उस समय सीमांकन में सभी प्रभावित भू-स्वामियों को शामिल किया गया था? क्या पुरानी रिपोर्ट के आधार पर वर्तमान विवाद का कोई समाधान संभव है?
इन प्रश्नों के उत्तर के लिए केवल रिपोर्ट का उल्लेख पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित राजस्व अभिलेखों और स्थल निरीक्षण की आवश्यकता होगी। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पुराने सीमांकन प्रतिवेदन और वर्तमान शिकायत के बीच क्या संबंध है।
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा और ‘ऊपर तक पहुंच’ के धौंस के आरोप
बीजापुर में जमीन से जुड़े मामलों को लेकर कथित भूमाफियाओं के प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ कथित भूमाफिया राजनीतिक संरक्षण अथवा प्रभावशाली लोगों तक अपनी पहुंच का हवाला देकर खुलेआम अवैध अतिक्रमण करते आ रहे हैं। विरोध करने वाले लोगों के सामने कथित तौर पर ऊपर तक पहुंच होने का धौंस दिखाए जाने की शिकायतों की भी चर्चा है।
यदि किसी व्यक्ति द्वारा वास्तव में राजनीतिक संपर्कों या प्रभावशाली पहुंच का इस्तेमाल कर किसी भू-स्वामी को दबाव में लेने, निर्माण कराने अथवा प्रशासनिक कार्रवाई प्रभावित करने की कोशिश की गई है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय होगा। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
स्थानीय स्तर पर उठ रही चिंताओं के बीच यह सवाल भी सामने आ रहा है कि क्या बीजापुर में जमीन से जुड़े कुछ मामलों में कथित प्रभावशाली तत्वों का दबदबा इतना बढ़ गया है कि आम नागरिकों को अपनी शिकायतों के निराकरण के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं? क्या जमीन के विवादों में कानून और राजस्व प्रक्रिया से अधिक रसूख की भूमिका दिखाई देने लगी है?
कुछ लोगों की ओर से बीजापुर जिला भूमाफियाओं के गिरफ्त में होने जैसी गंभीर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। हालांकि पूरे जिले को माफियाओं के नियंत्रण में बताना या राजनीतिक संरक्षण को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित नहीं होगा। इन आरोपों की पुष्टि के लिए अन्य प्रकरणों, शिकायतों, जांच प्रतिवेदनों और ठोस दस्तावेजी साक्ष्यों की जरूरत है।
इस मामले में भी अभी किसी राजनीतिक व्यक्ति, जनप्रतिनिधि अथवा अधिकारी की संलिप्तता प्रमाणित नहीं हुई है। इसलिए किसी पर दोषारोपण करने के बजाय प्रशासनिक जांच के जरिए सच्चाई सामने लाना जरूरी है।
आदिवासी भूमि के अधिकार और कानूनी पहलू पर भी नजर
शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं को अनुसूचित जनजाति वर्ग का बताए जाने के कारण भूमि के हस्तांतरण और अधिकार से संबंधित कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी भूमि से जुड़े मामलों में लागू कानून, भूमि की प्रकृति, क्षेत्र की स्थिति, हस्तांतरण का स्वरूप और संबंधित दस्तावेजों की भूमिका अहम हो सकती है।
लेकिन केवल शिकायतकर्ता के अनुसूचित जनजाति वर्ग का होने या दूसरे पक्ष के कथित गैर-आदिवासी होने के आधार पर ही किसी व्यक्ति को अतिक्रमणकारी अथवा किसी लेन-देन को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए भूमि के स्वामित्व, अधिकार, हस्तांतरण, कब्जे और निर्माण की वैधता की विधिवत जांच आवश्यक है।
यदि भूमि पर अवैध कब्जा, प्रतिबंधित हस्तांतरण अथवा किसी अन्य प्रकार का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित कानून के अनुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना भी आवश्यक है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल, जवाब का इंतजार
इस प्रकरण में तहसील प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। शिकायतकर्ता ने सीमांकन की तारीख निर्धारित होने और शुल्क जमा करने की बात कही है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि सीमांकन वास्तव में 10 अक्टूबर 2026 को हुआ या नहीं। यदि हुआ, तो उसका प्रतिवेदन क्या कहता है? यदि नहीं हुआ, तो किन कारणों से कार्रवाई लंबित रही? क्या शिकायत पर स्थल निरीक्षण किया गया? क्या संबंधित निर्माण की वर्तमान स्थिति दर्ज की गई? क्या निर्माण कराने वाले पक्ष के दस्तावेजों का परीक्षण हुआ?
इसके अलावा यदि निर्माण कार्य जारी रहने से भूमि की मौजूदा स्थिति प्रभावित हुई है, तो राजस्व विभाग मौके का सत्यापन कर आवश्यक रिकॉर्ड तैयार करे। शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष के दस्तावेजों का मिलान करते हुए वास्तविक भूमि की पहचान, सीमाएं और अधिकार स्पष्ट किए जाएं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि शिकायत के निराकरण में किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव अथवा पक्षपात की गुंजाइश न रहे। भूमि विवादों में प्रशासनिक निष्पक्षता ही आम नागरिकों का भरोसा कायम रख सकती है।
अब कार्रवाई नहीं, पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत
बीजापुर का यह मामला अब केवल सोनसाय बाकड़े की भूमि से जुड़े विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। इसने भूमि सीमांकन की पारदर्शिता, कथित अतिक्रमण, राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता, आदिवासी भूमि अधिकार और प्रभावशाली लोगों के कथित हस्तक्षेप जैसे मुद्दों को एक साथ सामने ला दिया है।
यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध कानून के अनुरूप कार्रवाई होनी चाहिए। यदि अभिलेखों में किसी प्रकार की गलतफहमी या भूमि पहचान का विवाद सामने आता है, तो उसे भी दस्तावेजों और विधिसम्मत प्रक्रिया से स्पष्ट किया जाना चाहिए। निष्पक्ष जांच से ही यह तय हो सकेगा कि वास्तविक विवाद क्या है और किसकी जिम्मेदारी बनती है।
अब निगाहें तहसील प्रशासन और जिला प्रशासन के रुख पर टिकी हैं। क्या सीमांकन के संबंध में स्थिति स्पष्ट होगी? क्या कथित निर्माण की वैधता की जांच होगी? क्या राजनीतिक संरक्षण और ऊंची पहुंच के धौंस से संबंधित आरोपों की पड़ताल की जाएगी? और क्या भूमि संबंधी शिकायतों पर समयबद्ध तथा पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी?
बीजापुर में जमीन के इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आम भू-स्वामी को अपनी ही जमीन की सुरक्षा के लिए रसूख के सामने झुकना पड़ेगा, या कानून के आधार पर उसे न्याय मिलेगा?




